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भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ? By वनिता कासनियां पंजाब हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।गीता (१०।२९) में भगवान श्रीकृष्ण ने नागों में शेषनाग को अपना स्वरूप बताते हुए कहा है—‘मैं नागों में शेषनाग हूँ ।’भगवान शेषनाग हजार फणों वाले हैं, कमल की नाल की तरह श्वेत रंग के हैं, मणियों से मण्डित हैं, नीले वस्त्र धारण करते हैं । उनका यह संकर्षण विग्रह समस्त जगत का आधार है; क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी भगवान शेष के एक फण पर राई के दाने के समान स्थित है ।भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ?चाक्षुष मन्वन्तर के प्रारम्भ में प्रजापति दक्ष ने महर्षि कश्यप को अपनी ग्यारह कन्याएं पत्नी रूप में प्रदान कीं । उन कन्याओं में से एक कद्रू थी, जिसने करोड़ों महा सर्पों को जन्म दिया । वे सभी सर्प विष रूपी बल से सम्पन्न, उग्र और पांच सौ फणों से युक्त थे । उन सब में प्रथम व श्रेष्ठ फणिराज ‘शेषनाग’ थे, जो अनन्त एवं परात्पर परमेश्वर हैं ।एक दिन भगवान श्रीहरि ने शेष से कहा—‘इस भूमण्डल को अपने ऊपर धारण करने की शक्ति दूसरे किसी और में नहीं है; इसलिए इस भूलोक को तुम्हीं अपने मस्तक पर धारण करो । तुम्हारा पराक्रम अनन्त है; इसलिए तुम्हें ‘अनन्त’ कहा गया है । जन-कल्याण के लिए तुम्हें यह कार्य अवश्य करना चाहिए ।’शेष ने भगवान से कहा—‘पृथ्वी का भार उठाने के लिए आप कोई अवधि निश्चित कर दीजिए । जितने दिन की अवधि होगी, उतने समय तक मैं आपकी आज्ञा से भूमि का भार अपने सिर पर धारण करुंगा ।’भगवान ने कहा—‘नागराज ! तुम अपने सहस्त्र मुखों से प्रतिदिन मेरे गुणों को बताने वाले अलग-अलग नए-नए नामों का उच्चारण किया करो । जब मेरे दिव्य नाम समाप्त हो जाएं, तब तुम अपने सिर से पृथ्वी का भार उतार कर सुखी हो जाना ।’(हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।)नागराज शेष ने कहा—‘पृथ्वी का आधार तो मैं हो जाऊंगा, किंतु मेरा आधार कौन होगा ? बिना किसी आधार के मैं जल के ऊपर कैसे स्थित रहूंगा ?’भगवान ने कहा—‘तुम इसकी चिंता मत करो । मैं ‘कच्छप’ बन कर महान भार से युक्त तुम्हारे विशाल शरीर को धारण करुंगा ।’तब नागराज शेष भगवान श्रीहरि को नमस्कार कर पाताल से लाख योजन नीचे चले गए । वहां अपने हाथ से अत्यंत गुरुतर (भारी) भूमण्डल को पकड़ कर प्रचण्ड पराक्रमी शेष ने अपने एक ही फन पर पृथ्वी को धारण कर लिया । भगवान अनन्त, (संकर्षण, शेष) के पाताल चले जाने पर ब्रह्माजी की प्रेरणा से अन्य नाग भी उनके पीछे-पीछे चले गए । कोई अतल में, कोई वितल में, कोई सुतल में और महातल में तथा कितने ही तलातल और रसातल में जाकर रहने लगे । ब्रह्माजी ने उन सर्पों के लिए पृथ्वी पर ‘रमणक द्वीप’ प्रदान किया । महाभारत के आदिपर्व की कथामहाभारत के आदिपर्व में यह कथा कुछ इस तरह है—अपने भाइयों का सौतेले भाइयों के झगड़े से परेशान होकर शेषनाग ने उनका साथ छोड़ दिया और विरक्त होकर कठिन तपस्या शुरु कर दी । वे गंधमादन, बदरिकाश्रम, गोकर्ण और हिमालय की तराई आदि स्थानों पर एकान्तवास में रहते और केवल वायु पीते थे । इससे उनके शरीर का मांस, त्वचा और नाड़ियां बिल्कुल सूख गईं । उनके धैर्य और तप को देख कर पितामह ब्रह्मा उनके पास आए और पूछा—‘शेष ! तुम्हारे इस घोर तपस्या करने का क्या उद्देश्य है ? तुम प्रजा के हित का कोई काम क्यों नहीं करते हो ?’शेष जी ने कहा—‘मेरे भाई सौतेली मां विनता और उसके पुत्रों गरुड़ और अरुण से द्वेष करते हैं; इसलिए मैं उनसे ऊब कर तपस्या कर रहा हूँ । अब मैं तपस्या करके यह शरीर छोड़ दूंगा परंतु मुझे चिंता इस बात की है कि मरने के बाद भी मेरा उन दुष्टों का संग न हो ।’ब्रह्माजी ने कहा—‘मैं तुम्हारे मन और इन्द्रियों के संयम से बहुत प्रसन्न हूँ । चिंता छोड़ कर प्रजा के हित के लिए एक काम करो । यह सारी पृथ्वी, पर्वत, वन, सागर, ग्राम आदि हिलते-डोलते रहते हैं । तुम इसे इस प्रकार धारण करो कि यह अचल हो जाए ।’शेष जी ने कहा—‘मैं आपकी आज्ञा का पालन कर इस पृथ्वी को इस प्रकार धारण करुंगा, जिससे वह हिले-डुले नहीं । आप इसे मेरे सिर पर रख दीजिए ।’ब्रह्माजी ने कहा—‘शेष ! पृथ्वी तुम्हें मार्ग देगी, तुम उसके भीतर घुस जाओ । ‘ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन करते हुए शेष जी भू-विवर में प्रवेश करके नीचे चले गए और समुद्र से घिरी पृथ्वी को चारों ओर से पकड़ कर सिर पर उठा लिया। वे तभी से स्थिर भाव में होकर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं।

भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ?

By वनिता कासनियां पंजाब

हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।

गीता (१०।२९) में भगवान श्रीकृष्ण ने नागों में शेषनाग को अपना स्वरूप बताते हुए कहा है—‘मैं नागों में शेषनाग हूँ ।’

भगवान शेषनाग हजार फणों वाले हैं, कमल की नाल की तरह श्वेत रंग के हैं, मणियों से मण्डित हैं, नीले वस्त्र धारण करते हैं । उनका यह संकर्षण विग्रह समस्त जगत का आधार है; क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी भगवान शेष के एक फण पर राई के दाने के समान स्थित है ।

भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ?

चाक्षुष मन्वन्तर के प्रारम्भ में प्रजापति दक्ष ने महर्षि कश्यप को अपनी ग्यारह कन्याएं पत्नी रूप में प्रदान कीं । उन कन्याओं में से एक कद्रू थी, जिसने करोड़ों महा सर्पों को जन्म दिया । वे सभी सर्प विष रूपी बल से सम्पन्न, उग्र और पांच सौ फणों से युक्त थे । उन सब में प्रथम व श्रेष्ठ फणिराज ‘शेषनाग’ थे, जो अनन्त एवं परात्पर परमेश्वर हैं ।
एक दिन भगवान श्रीहरि ने शेष से कहा—‘इस भूमण्डल को अपने ऊपर धारण करने की शक्ति दूसरे किसी और में नहीं है; इसलिए इस भूलोक को तुम्हीं अपने मस्तक पर धारण करो । तुम्हारा पराक्रम अनन्त है; इसलिए तुम्हें ‘अनन्त’ कहा गया है । जन-कल्याण के लिए तुम्हें यह कार्य अवश्य करना चाहिए ।’

शेष ने भगवान से कहा—‘पृथ्वी का भार उठाने के लिए आप कोई अवधि निश्चित कर दीजिए । जितने दिन की अवधि होगी, उतने समय तक मैं आपकी आज्ञा से भूमि का भार अपने सिर पर धारण करुंगा ।’

भगवान ने कहा—‘नागराज ! तुम अपने सहस्त्र मुखों से प्रतिदिन मेरे गुणों को बताने वाले अलग-अलग नए-नए नामों का उच्चारण किया करो । जब मेरे दिव्य नाम समाप्त हो जाएं, तब तुम अपने सिर से पृथ्वी का भार उतार कर सुखी हो जाना ।’

(हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।)

नागराज शेष ने कहा—‘पृथ्वी का आधार तो मैं हो जाऊंगा, किंतु मेरा आधार कौन होगा ? बिना किसी आधार के मैं जल के ऊपर कैसे स्थित रहूंगा ?’

भगवान ने कहा—‘तुम इसकी चिंता मत करो । मैं ‘कच्छप’ बन कर महान भार से युक्त तुम्हारे विशाल शरीर को धारण करुंगा ।’

तब नागराज शेष भगवान श्रीहरि को नमस्कार कर पाताल से लाख योजन नीचे चले गए । वहां अपने हाथ से अत्यंत गुरुतर (भारी) भूमण्डल को पकड़ कर प्रचण्ड पराक्रमी शेष ने अपने एक ही फन पर पृथ्वी को धारण कर लिया । 

भगवान अनन्त, (संकर्षण, शेष) के पाताल चले जाने पर ब्रह्माजी की प्रेरणा से अन्य नाग भी उनके पीछे-पीछे चले गए । कोई अतल में, कोई वितल में, कोई सुतल में और महातल में तथा कितने ही तलातल और रसातल में जाकर रहने लगे । 

ब्रह्माजी ने उन सर्पों के लिए पृथ्वी पर ‘रमणक द्वीप’ प्रदान किया । 

महाभारत के आदिपर्व की कथा
महाभारत के आदिपर्व में यह कथा कुछ इस तरह है—

अपने भाइयों का सौतेले भाइयों के झगड़े से परेशान होकर शेषनाग ने उनका साथ छोड़ दिया और विरक्त होकर कठिन तपस्या शुरु कर दी । वे गंधमादन, बदरिकाश्रम, गोकर्ण और हिमालय की तराई आदि स्थानों पर एकान्तवास में रहते और केवल वायु पीते थे । इससे उनके शरीर का मांस, त्वचा और नाड़ियां बिल्कुल सूख गईं । 

उनके धैर्य और तप को देख कर पितामह ब्रह्मा उनके पास आए और पूछा—‘शेष ! तुम्हारे इस घोर तपस्या करने का क्या उद्देश्य है ? तुम प्रजा के हित का कोई काम क्यों नहीं करते हो ?’

शेष जी ने कहा—‘मेरे भाई सौतेली मां विनता और उसके पुत्रों गरुड़ और अरुण से द्वेष करते हैं; इसलिए मैं उनसे ऊब कर तपस्या कर रहा हूँ । अब मैं तपस्या करके यह शरीर छोड़ दूंगा परंतु मुझे चिंता इस बात की है कि मरने के बाद भी मेरा उन दुष्टों का संग न हो ।’

ब्रह्माजी ने कहा—‘मैं तुम्हारे मन और इन्द्रियों के संयम से बहुत प्रसन्न हूँ । चिंता छोड़ कर प्रजा के हित के लिए एक काम करो । यह सारी पृथ्वी, पर्वत, वन, सागर, ग्राम आदि हिलते-डोलते रहते हैं । तुम इसे इस प्रकार धारण करो कि यह अचल हो जाए ।’

शेष जी ने कहा—‘मैं आपकी आज्ञा का पालन कर इस पृथ्वी को इस प्रकार धारण करुंगा, जिससे वह हिले-डुले नहीं । आप इसे मेरे सिर पर रख दीजिए ।’

ब्रह्माजी ने कहा—‘शेष ! पृथ्वी तुम्हें मार्ग देगी, तुम उसके भीतर घुस जाओ । ‘

ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन करते हुए शेष जी भू-विवर में प्रवेश करके नीचे चले गए और समुद्र से घिरी पृथ्वी को चारों ओर से पकड़ कर सिर पर उठा लिया। वे तभी से स्थिर भाव में होकर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं।

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|| श्री हरि: || --- :: x :: --- 🥀🥀🙏सत्संग की आवश्यकता 🙏🥀🥀     By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब                अपने अन्त:करण में कोई गड़बड़ी आ जाय तो भगवान् को पुकारो, हे नाथ ! हे नाथ !! पुकारो | यह एक दवाई है असली भगवान् को याद करो, खूब मस्त रहो | अपने कल्याण के लिये, पति के कल्याण के लिये, माता-पिता के कल्याण के लिये भगवान् के भजन में लग जाओ | पुरुष यदि श्रेष्ठ, उतम होता है तो वह अपने ही कुल का उध्दार करता है; परन्तु स्त्री श्रेष्ठ होती है तो वह दोनों कुलों का उध्दार कर देती है –        एवा उतम गुण थी उभय सुकुल उजवालिये हे |        सखियाँ निज-निज निति धर्म सदा सम्भालिये हे || महाराज जनक चित्रकूट गये | वहाँ सीताजी सादे वेश में थीं | कितने प्रेम से पली थी सीताजी ! माता-पिता का उन पर बड़ा स्नेह था | जनकपुरी के कई राजकीय आदमी जनक जी के साथ में आये थे | उन्होंने सीताजी को साधारण वेश में देखा तो रो पड़े कि हमारे महाराज की पुत्री जंगल में रहकर दुःख पा रही है | रहने को जगह नहीं, खाने को अन्न नहीं, ...

हनुमानजी के पांच सगे भाई भी थे, जानिए उनके नाम ?🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाबहनुमानजी हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता होने की बात कही जाती है, दरअसल वह 33 करोड़ नहीं वरन् 33 कोटि देवी-देवता हैं। यानि कि उन्हीं देवी-देवताओं के विभिन्न रूप एवं अवतार हैं। अब स्वयं देव हों या उनके कोई मानव रूपी अवतार, सभी से जुड़े तथ्य एवं पौराणिक वर्णन काफी दिलचस्प हैं।रोचक जानकारी आज हम हनुमान जी के बारे में आपको कुछ रोचक जानकारी देंगे। बजरंगबली, पवन पुत्र, अंजनी पुत्र, राम भक्त, ऐसे ही कई नामों से पुकारा जाता है हनुमान जी को। यह बात शायद सभी जानते हैं लेकिन आगे बताए जा रहे कुछ तथ्य हर कोई नहीं जानता।भगवान शिव का अवतार सबसे पहली बात, हनुमान जी को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार अंजना नाम की एक अप्सरा को एक ऋषि द्वारा यह श्राप दिया गया कि जब भी वह प्रेम बंधन में पड़ेगी, उसका चेहरा एक वानर की भांति हो जाएगा। लेकिन इस श्राप से मुक्त होने के लिए भगवान ब्रह्मा ने अंजना की मदद की।अंजनी पुत्र उनकी मदद से अंजना ने धरती पर स्त्री रूप में जन्म लिया, यहां उसे वानरों के राजा केसरी से प्रेम हुआ। विवाह पश्चात श्राप से मुक्ति के लिए अंजना ने भगवान शिव की तपस्या आरंभ कर दी। तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। अंजना ने भगवान शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें।शिव आराधना ‘तथास्तु’ कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए, इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और इसी दौरान किसी दूसरे कोने में महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यज्ञ कर रहे थे।अंजना के हाथ में गिरा प्रसाद अग्नि देव ने उन्हें दैवीय ‘पायस’ दिया जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस पायस की कटोरी में थोड़ा सा पायस अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया।शिव का प्रसाद अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया और कुछ ही समय बाद उन्होंने वानर मुख वाले एक बालक को जन्म दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस बालक का नाम मारूति था, जिसे बाद में ‘हनुमान’ के नाम से जाना गया।अन्य कथा हनुमान जी से जुड़ा एक और तथ्य काफी रोचक है। एक कथा के अनुसार एक बार हनुमान जी ने श्रीराम की याद में अपने पूरे शरीर पर सिंदूर भी लगाया था। यह इसलिए क्योंकि एक बार उन्होंने माता सीता को सिंदूर लगाते हुए देख लिया। जब उन्होंने सिंदूर लगाने का कारण पूछा तो सीता जी ने बताया कि यह उनका श्रीराम के प्रति प्रेम एवं सम्मान का प्रतीक है।लाल हनुमान बस यह जानने की देरी ही थी कि हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया, यह दर्शाने के लिए कि वे भी श्रीराम से अति प्रेम करते हैं। इस घटना के बाद हनुमान का ‘लाल हनुमान’ रूप भी काफी प्रचलित हुआ।हनुमान शब्द का संस्कृत अर्थ हनुमान जी से जुड़े कुछ छोटे-छोटे तथ्य हैं, जो काफी कम लोग जानते हैं। जैसे कि उनका नाम, ‘हनुमान’ शब्द का यदि संस्कृत अर्थ निकाला जाए तो इसका मतलब होता है जिसका मुख या जबड़ा बिगड़ा हुआ हो।हनुमान और भीम अगली बात जो हम बताने जा रहे हैं उसे जान आप वाकई हैरत में पड़ने वाले हैं। महाभारत काल में पाण्डु पुत्र राजकुमार भीम अपने बल के लिए जाने जाते थे। कहते हैं वे हनुमान जी के ही भाई थे।ब्रह्मचारी हनुमान इसके अलावा जिन हनुमान जी को ब्रह्मचारी कहा जाता है, उनकी शादी भी हुई थी। उनके पुत्र का नाम मकरध्वज है। लेकिन इसके अलावा उनके पांच भाई भी थे, क्या आप जानते हैं?हनुमान जी के पांच सगे भाई जी हां... हनुमान जी के पांच सगे भाई थे और वो पांचों ही विवाहित थे। यह कोई कहानी या मात्र मनोरंजन का साधन बनाने के लिए हवा में बताई गई बात नहीं है, बल्कि सच्चाई है। हनुमान जी के पांच सगे भाई थे, इस बात का उल्लेख 'ब्रह्मांडपुराण' में मिलता है।ब्रह्मांडपुराण के अनुसार इस पुराण में भगवान हनुमान के पिता केसरी एवं उनके वंश का वर्णन शामिल है। बड़ी बात यह है कि पांचों भाइयों में बजरंगबली सबसे बड़े थे। यानी हनुमानजी को शामिल करने पर वानर राज केसरी के 6 पुत्र थे।सबसे बड़े थे बजरंगबली बजरंगबली के बाद क्रमशः मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान, धृतिमान थे। इन सभी के संतान भी थीं, जिससे इनका वंश वर्षों तक चला। हनुमानजी के बारे जानकारी वैसे तो रामायण, श्रीरामचरितमानस, महाभारत और भी कई हिंदू धर्म ग्रंथों में मिलती है। बाल वनिता महिला आश्रमलेकिन उनके बारे में कुछ ऐसी भी बातें हैं जो बहुत कम धर्म ग्रंथों में उपलब्ध है। 'ब्रह्मांडपुराण' उन्हीं में से एक है। पिता केसरी का वंशज इस महान ग्रंथ में हनुमान जी के जीवन एवं उनसे जुड़ी कई बातें हैं। इसी ग्रंथ में उल्लेख है कि बजरंगबली के पिता केसरी ने अंजना से विवाह किया था🌹🙏🙏जय श्री राम🙏🙏 🌹

हनुमानजी के पांच सगे भाई भी थे, जानिए उनके नाम ? 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब हनुमानजी हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी-देवता होने की बात कही जाती है, दरअसल वह 33 करोड़ नहीं वरन् 33 कोटि देवी-देवता हैं। यानि कि उन्हीं देवी-देवताओं के विभिन्न रूप एवं अवतार हैं। अब स्वयं देव हों या उनके कोई मानव रूपी अवतार, सभी से जुड़े तथ्य एवं पौराणिक वर्णन काफी दिलचस्प हैं। रोचक जानकारी आज हम हनुमान जी के बारे में आपको कुछ रोचक जानकारी देंगे। बजरंगबली, पवन पुत्र, अंजनी पुत्र, राम भक्त, ऐसे ही कई नामों से पुकारा जाता है हनुमान जी को। यह बात शायद सभी जानते हैं लेकिन आगे बताए जा रहे कुछ तथ्य हर कोई नहीं जानता। भगवान शिव का अवतार सबसे पहली बात, हनुमान जी को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार अंजना नाम की एक अप्सरा को एक ऋषि द्वारा यह श्राप दिया गया कि जब भी वह प्रेम बंधन में पड़ेगी, उसका चेहरा एक वानर की भांति हो जाएगा। लेकिन इस श्राप से मुक्त होने के लिए भगवान ब्रह्मा ने अंजना की मदद की। अंजनी पुत्र उनकी मदद से अंजना ने धरती पर स्त्री रूप में जन्म लिय...