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भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ? By वनिता कासनियां पंजाब हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।गीता (१०।२९) में भगवान श्रीकृष्ण ने नागों में शेषनाग को अपना स्वरूप बताते हुए कहा है—‘मैं नागों में शेषनाग हूँ ।’भगवान शेषनाग हजार फणों वाले हैं, कमल की नाल की तरह श्वेत रंग के हैं, मणियों से मण्डित हैं, नीले वस्त्र धारण करते हैं । उनका यह संकर्षण विग्रह समस्त जगत का आधार है; क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी भगवान शेष के एक फण पर राई के दाने के समान स्थित है ।भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ?चाक्षुष मन्वन्तर के प्रारम्भ में प्रजापति दक्ष ने महर्षि कश्यप को अपनी ग्यारह कन्याएं पत्नी रूप में प्रदान कीं । उन कन्याओं में से एक कद्रू थी, जिसने करोड़ों महा सर्पों को जन्म दिया । वे सभी सर्प विष रूपी बल से सम्पन्न, उग्र और पांच सौ फणों से युक्त थे । उन सब में प्रथम व श्रेष्ठ फणिराज ‘शेषनाग’ थे, जो अनन्त एवं परात्पर परमेश्वर हैं ।एक दिन भगवान श्रीहरि ने शेष से कहा—‘इस भूमण्डल को अपने ऊपर धारण करने की शक्ति दूसरे किसी और में नहीं है; इसलिए इस भूलोक को तुम्हीं अपने मस्तक पर धारण करो । तुम्हारा पराक्रम अनन्त है; इसलिए तुम्हें ‘अनन्त’ कहा गया है । जन-कल्याण के लिए तुम्हें यह कार्य अवश्य करना चाहिए ।’शेष ने भगवान से कहा—‘पृथ्वी का भार उठाने के लिए आप कोई अवधि निश्चित कर दीजिए । जितने दिन की अवधि होगी, उतने समय तक मैं आपकी आज्ञा से भूमि का भार अपने सिर पर धारण करुंगा ।’भगवान ने कहा—‘नागराज ! तुम अपने सहस्त्र मुखों से प्रतिदिन मेरे गुणों को बताने वाले अलग-अलग नए-नए नामों का उच्चारण किया करो । जब मेरे दिव्य नाम समाप्त हो जाएं, तब तुम अपने सिर से पृथ्वी का भार उतार कर सुखी हो जाना ।’(हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।)नागराज शेष ने कहा—‘पृथ्वी का आधार तो मैं हो जाऊंगा, किंतु मेरा आधार कौन होगा ? बिना किसी आधार के मैं जल के ऊपर कैसे स्थित रहूंगा ?’भगवान ने कहा—‘तुम इसकी चिंता मत करो । मैं ‘कच्छप’ बन कर महान भार से युक्त तुम्हारे विशाल शरीर को धारण करुंगा ।’तब नागराज शेष भगवान श्रीहरि को नमस्कार कर पाताल से लाख योजन नीचे चले गए । वहां अपने हाथ से अत्यंत गुरुतर (भारी) भूमण्डल को पकड़ कर प्रचण्ड पराक्रमी शेष ने अपने एक ही फन पर पृथ्वी को धारण कर लिया । भगवान अनन्त, (संकर्षण, शेष) के पाताल चले जाने पर ब्रह्माजी की प्रेरणा से अन्य नाग भी उनके पीछे-पीछे चले गए । कोई अतल में, कोई वितल में, कोई सुतल में और महातल में तथा कितने ही तलातल और रसातल में जाकर रहने लगे । ब्रह्माजी ने उन सर्पों के लिए पृथ्वी पर ‘रमणक द्वीप’ प्रदान किया । महाभारत के आदिपर्व की कथामहाभारत के आदिपर्व में यह कथा कुछ इस तरह है—अपने भाइयों का सौतेले भाइयों के झगड़े से परेशान होकर शेषनाग ने उनका साथ छोड़ दिया और विरक्त होकर कठिन तपस्या शुरु कर दी । वे गंधमादन, बदरिकाश्रम, गोकर्ण और हिमालय की तराई आदि स्थानों पर एकान्तवास में रहते और केवल वायु पीते थे । इससे उनके शरीर का मांस, त्वचा और नाड़ियां बिल्कुल सूख गईं । उनके धैर्य और तप को देख कर पितामह ब्रह्मा उनके पास आए और पूछा—‘शेष ! तुम्हारे इस घोर तपस्या करने का क्या उद्देश्य है ? तुम प्रजा के हित का कोई काम क्यों नहीं करते हो ?’शेष जी ने कहा—‘मेरे भाई सौतेली मां विनता और उसके पुत्रों गरुड़ और अरुण से द्वेष करते हैं; इसलिए मैं उनसे ऊब कर तपस्या कर रहा हूँ । अब मैं तपस्या करके यह शरीर छोड़ दूंगा परंतु मुझे चिंता इस बात की है कि मरने के बाद भी मेरा उन दुष्टों का संग न हो ।’ब्रह्माजी ने कहा—‘मैं तुम्हारे मन और इन्द्रियों के संयम से बहुत प्रसन्न हूँ । चिंता छोड़ कर प्रजा के हित के लिए एक काम करो । यह सारी पृथ्वी, पर्वत, वन, सागर, ग्राम आदि हिलते-डोलते रहते हैं । तुम इसे इस प्रकार धारण करो कि यह अचल हो जाए ।’शेष जी ने कहा—‘मैं आपकी आज्ञा का पालन कर इस पृथ्वी को इस प्रकार धारण करुंगा, जिससे वह हिले-डुले नहीं । आप इसे मेरे सिर पर रख दीजिए ।’ब्रह्माजी ने कहा—‘शेष ! पृथ्वी तुम्हें मार्ग देगी, तुम उसके भीतर घुस जाओ । ‘ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन करते हुए शेष जी भू-विवर में प्रवेश करके नीचे चले गए और समुद्र से घिरी पृथ्वी को चारों ओर से पकड़ कर सिर पर उठा लिया। वे तभी से स्थिर भाव में होकर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं।

भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ?

By वनिता कासनियां पंजाब

हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।

गीता (१०।२९) में भगवान श्रीकृष्ण ने नागों में शेषनाग को अपना स्वरूप बताते हुए कहा है—‘मैं नागों में शेषनाग हूँ ।’

भगवान शेषनाग हजार फणों वाले हैं, कमल की नाल की तरह श्वेत रंग के हैं, मणियों से मण्डित हैं, नीले वस्त्र धारण करते हैं । उनका यह संकर्षण विग्रह समस्त जगत का आधार है; क्योंकि सम्पूर्ण पृथ्वी भगवान शेष के एक फण पर राई के दाने के समान स्थित है ।

भगवान शेषनाग पृथ्वी को क्यों धारण करते हैं ?

चाक्षुष मन्वन्तर के प्रारम्भ में प्रजापति दक्ष ने महर्षि कश्यप को अपनी ग्यारह कन्याएं पत्नी रूप में प्रदान कीं । उन कन्याओं में से एक कद्रू थी, जिसने करोड़ों महा सर्पों को जन्म दिया । वे सभी सर्प विष रूपी बल से सम्पन्न, उग्र और पांच सौ फणों से युक्त थे । उन सब में प्रथम व श्रेष्ठ फणिराज ‘शेषनाग’ थे, जो अनन्त एवं परात्पर परमेश्वर हैं ।
एक दिन भगवान श्रीहरि ने शेष से कहा—‘इस भूमण्डल को अपने ऊपर धारण करने की शक्ति दूसरे किसी और में नहीं है; इसलिए इस भूलोक को तुम्हीं अपने मस्तक पर धारण करो । तुम्हारा पराक्रम अनन्त है; इसलिए तुम्हें ‘अनन्त’ कहा गया है । जन-कल्याण के लिए तुम्हें यह कार्य अवश्य करना चाहिए ।’

शेष ने भगवान से कहा—‘पृथ्वी का भार उठाने के लिए आप कोई अवधि निश्चित कर दीजिए । जितने दिन की अवधि होगी, उतने समय तक मैं आपकी आज्ञा से भूमि का भार अपने सिर पर धारण करुंगा ।’

भगवान ने कहा—‘नागराज ! तुम अपने सहस्त्र मुखों से प्रतिदिन मेरे गुणों को बताने वाले अलग-अलग नए-नए नामों का उच्चारण किया करो । जब मेरे दिव्य नाम समाप्त हो जाएं, तब तुम अपने सिर से पृथ्वी का भार उतार कर सुखी हो जाना ।’

(हजार फणों वाले शेषनाग भगवान श्रीहरि के परम भक्त हैं । वे अपने एक हजार मुखों और दो हजार जिह्वाओं (सांप के मुख में दो जीभ होती हैं) से सदा भगवान श्रीहरि का नाम जप करते रहते हैं। भगवान शेष सेवा-भक्ति के आदर्श उदाहरण हैं । वे भगवान का पलंग, छत्र, पंखा बन कर श्रीहरि की सेवा करते हैं ।)

नागराज शेष ने कहा—‘पृथ्वी का आधार तो मैं हो जाऊंगा, किंतु मेरा आधार कौन होगा ? बिना किसी आधार के मैं जल के ऊपर कैसे स्थित रहूंगा ?’

भगवान ने कहा—‘तुम इसकी चिंता मत करो । मैं ‘कच्छप’ बन कर महान भार से युक्त तुम्हारे विशाल शरीर को धारण करुंगा ।’

तब नागराज शेष भगवान श्रीहरि को नमस्कार कर पाताल से लाख योजन नीचे चले गए । वहां अपने हाथ से अत्यंत गुरुतर (भारी) भूमण्डल को पकड़ कर प्रचण्ड पराक्रमी शेष ने अपने एक ही फन पर पृथ्वी को धारण कर लिया । 

भगवान अनन्त, (संकर्षण, शेष) के पाताल चले जाने पर ब्रह्माजी की प्रेरणा से अन्य नाग भी उनके पीछे-पीछे चले गए । कोई अतल में, कोई वितल में, कोई सुतल में और महातल में तथा कितने ही तलातल और रसातल में जाकर रहने लगे । 

ब्रह्माजी ने उन सर्पों के लिए पृथ्वी पर ‘रमणक द्वीप’ प्रदान किया । 

महाभारत के आदिपर्व की कथा
महाभारत के आदिपर्व में यह कथा कुछ इस तरह है—

अपने भाइयों का सौतेले भाइयों के झगड़े से परेशान होकर शेषनाग ने उनका साथ छोड़ दिया और विरक्त होकर कठिन तपस्या शुरु कर दी । वे गंधमादन, बदरिकाश्रम, गोकर्ण और हिमालय की तराई आदि स्थानों पर एकान्तवास में रहते और केवल वायु पीते थे । इससे उनके शरीर का मांस, त्वचा और नाड़ियां बिल्कुल सूख गईं । 

उनके धैर्य और तप को देख कर पितामह ब्रह्मा उनके पास आए और पूछा—‘शेष ! तुम्हारे इस घोर तपस्या करने का क्या उद्देश्य है ? तुम प्रजा के हित का कोई काम क्यों नहीं करते हो ?’

शेष जी ने कहा—‘मेरे भाई सौतेली मां विनता और उसके पुत्रों गरुड़ और अरुण से द्वेष करते हैं; इसलिए मैं उनसे ऊब कर तपस्या कर रहा हूँ । अब मैं तपस्या करके यह शरीर छोड़ दूंगा परंतु मुझे चिंता इस बात की है कि मरने के बाद भी मेरा उन दुष्टों का संग न हो ।’

ब्रह्माजी ने कहा—‘मैं तुम्हारे मन और इन्द्रियों के संयम से बहुत प्रसन्न हूँ । चिंता छोड़ कर प्रजा के हित के लिए एक काम करो । यह सारी पृथ्वी, पर्वत, वन, सागर, ग्राम आदि हिलते-डोलते रहते हैं । तुम इसे इस प्रकार धारण करो कि यह अचल हो जाए ।’

शेष जी ने कहा—‘मैं आपकी आज्ञा का पालन कर इस पृथ्वी को इस प्रकार धारण करुंगा, जिससे वह हिले-डुले नहीं । आप इसे मेरे सिर पर रख दीजिए ।’

ब्रह्माजी ने कहा—‘शेष ! पृथ्वी तुम्हें मार्ग देगी, तुम उसके भीतर घुस जाओ । ‘

ब्रह्माजी की आज्ञा का पालन करते हुए शेष जी भू-विवर में प्रवेश करके नीचे चले गए और समुद्र से घिरी पृथ्वी को चारों ओर से पकड़ कर सिर पर उठा लिया। वे तभी से स्थिर भाव में होकर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं।

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(कोई नहीं) ॥3॥ घनाक्षरीभानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो।पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो॥कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।बल कैधौं बीररस, धीरज कै, साहस कै,तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो॥4॥ भावार्थ - सूर्यभगवान के समीप में हनुमानजी विद्या पढ़ने के लिये गये, सूर्यदेव ने मन में बालकों का खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने के पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है)। हनुमानजी ने भास्कर की ओर मुख करके पीठ की तरफ से पैरों से प्रसन्नमन आकाशमार्ग में बालकों के खेल के समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का भ्रम नहीं हुआ। इस अचरज के खेल को देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, रूद्र और ब्रह्मा की आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्त में खलबली-सी उत्पन्न हो गयी। तुलसीदास जी कहते हैं-सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इन सबका सार ही शरीर धारण किये हैं ? ॥4॥ भारतमें पारथके रथकेतु कपिराज,गाज्यो सुनि कुरूराज दल हलबल भो।कहृो द्रोन भीषम समीरसुत महाबीर,बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो॥बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि,फलँग फलाँगहूतें घाटि नभतल भो।नाइ-नाइ माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,हनुमान देखे जगजीवन को फल भो॥5॥ भावार्थ - महाभारत में अर्जुन के रथ की पताकापर कपिराज हनुमानजी ने गर्जन किया, जिसको सुनकर दुर्योधन की सेना में घबराहट उत्पन्न हो गयी। द्रोणाचार्य और भीष्म-पितामह ने कहा कि ये महाबली पवनकुमार हैं। जिनका बल वीररस रूपी समुद्र का जल हुआ है। इनके स्वाभाविक ही बालकों के खेल के समान धरती से सूर्य तक के कुदान ने आकाश मण्डलों एक पग से कम कर दिया था। सब योद्धागण मस्तक नवा-नवाकर और हाथ जोड़-जोड़कर देखते हैं। इस प्रकार हनुमानजी का दर्शन पाने से उन्हें संसार में जीने का फल मिल गया॥ 5॥ गोपद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक,निपट निसंक परपुर गलबल भो।द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो॥संकटसमाज असमंजस भो रामराज,काज जुग-पूगनिको करतल पल भो।साहसी समत्थ तुलसीको नाह जाकी बाँह,लोकपाल पालनको फिर थिर भो॥6॥ भावार्थ - समुद्र को गोखुर के समान करके निडर होकर लंका जैसी (सुरक्षित नगरी को) होलिका के सदृश जला डाला, जिससे पराये (शत्रु के) पुर में गड़बड़ी मच गयी। द्रोण जैसा भारी पर्वत खेल में ही उखाड़ गेंद की तरह उठा लिया, वह कपिराज के लिये बेल फल के समान क्रीड़ा की सामग्री बन गया। रामराज्य मे अपार संकट (लक्ष्मण शक्ति) से असमंजस उत्पनन्नस हुआ (उस समय जिस पराक्रम से) युगसमूह में होने वाला काम पलभर में मुट्ठी में आ गया। तुलसी के स्वामी बड़े साहसी और सामर्थ्यवान है, जिनकी भुजाएँ लोकपालों को पालन करने तथा उन्हें फिर से स्थिरतापूर्वक बसाने का स्थान हुई॥6॥ कमठकी पीठि जाके गोड़निकी गाड़ै मानोनापके भाजन भरि जलनिधि-जल भो।जातुधान-दावन परावनको दुर्ग भयो,महामीनबास तिमि तोमनिको थल भो॥कुंभकर्न-रावन-पयोदनाद-ईंधनकोतुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो।भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान-सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो॥7॥ बाल वनिता महिला आश्रमभावार्थ - कच्छप की पीठ में जिनके पाँव गड़हे समुद्र का जल भरने के लिये मानो नाप के पात्र (बर्तन) हुए। राक्षसों का नाश करते समय वह (समुद्र) ही उनके भागकर छिपने का गढ़ हुआ तथा वही बहुत-से बड़े-बड़े मत्स्यों के रहने का स्थान हुआ। तुलसीदास जी कहते हैं - रावण, कुंभकर्ण और मेघनादरूपी ईंधन को जलाने के निमित्त जिनका प्रताप प्रचण्ड अग्नि हुआ। भीष्म पितामह कहते हैं - मेरी समझ में हनुमान जी के समान अत्यन्त बलवान तीनों काल और तीनों लोकों में कोई नहीं हुआ॥ 7॥

हनुमानबाहुक By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब 🙏   श्री गणेशाय नमः🚩 श्री जानकीवल्लभो विजयते🚩 मदगोस्वामितुलसीदासकृत🚩 हनुमानबाहुक🚩   छप्पय सिंधु-तरन, सिय सोच हरन, रबि-बालबरन-तनु। भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु॥ गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव। जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव॥ कह तुलसीदास सेवत सुलभ, सेवक हित संतत निकट। गुनगनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-बिकट॥1॥   भावार्थ - जिनके शरीर का रंग उदयकाल के सूर्य के समान है, जो समुद्र लाँघकर श्री जानकीजी के शोक को हरने वाले, आजानुबाहु, डरावनी सूरतवाले और मानो काल के भी काल हैं। लंका-रूपी गंम्भीर वन को, जो जलाने योग्य नहीं था, उसे जिन्होंने निःशंक जलाया और जो टेढ़ी भौंहोंवाले तथा बलवान राक्षसों के मान और गर्व का नाश करने वाले हैं, तुलसीदासजी कहते हैं - वे श्रीपवनकुमार सेवा करने पर बड़ी सुगमता से प्राप्त होने वाले, अपने सेवकों की भलाई करने के लिए सदा समीप रहने वाले तथा गुण गाने, प्रणाम करने एवं स्मरण और नाम जपने से सब भयानक संकटों को नाश करने वाले हैं॥1॥   स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरून-तेज-घन। उर बिसाल, भुजदंड च...

|| श्री हरि: ||--- :: x :: ---🥀🥀🙏सत्संग की आवश्यकता 🙏🥀🥀 By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब अपने अन्त:करण में कोई गड़बड़ी आ जाय तो भगवान् को पुकारो, हे नाथ ! हे नाथ !! पुकारो | यह एक दवाई है असली भगवान् को याद करो, खूब मस्त रहो | अपने कल्याण के लिये, पति के कल्याण के लिये, माता-पिता के कल्याण के लिये भगवान् के भजन में लग जाओ | पुरुष यदि श्रेष्ठ, उतम होता है तो वह अपने ही कुल का उध्दार करता है; परन्तु स्त्री श्रेष्ठ होती है तो वह दोनों कुलों का उध्दार कर देती है – एवा उतम गुण थी उभय सुकुल उजवालिये हे | सखियाँ निज-निज निति धर्म सदा सम्भालिये हे ||महाराज जनक चित्रकूट गये | वहाँ सीताजी सादे वेश में थीं | कितने प्रेम से पली थी सीताजी ! माता-पिता का उन पर बड़ा स्नेह था | जनकपुरी के कई राजकीय आदमी जनक जी के साथ में आये थे | उन्होंने सीताजी को साधारण वेश में देखा तो रो पड़े कि हमारे महाराज की पुत्री जंगल में रहकर दुःख पा रही है | रहने को जगह नहीं, खाने को अन्न नहीं, पहनने को पूरा बढ़िया कपड़ा नहीं ! परन्तु महाराज जनक बड़े राजी हुए और बोले कि बेटी ! तूने दोनों कुलों को पवित्र कर दिया – ‘पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ’ (मानस. २/२८७/१) | स्त्रियाँ श्रेष्ठ होती हैं तो दोनों कुलों का उध्दार करती हैं और खराब होती हैं तो दोनों कुलों का नाश करती हैं | इसलिये बहनों ! धर्म की, कुल की मर्यादा में चलो | बालकों पर, कुटुम्बियों पर आपके आचरणों का असर पड़ता है | समुद्र के बीच में यह पृथ्वी किस बल पर धारण की हुई है ? – गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतिभि: सत्यवादिभि: | अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही || (स्कन्दपुराण, २/७१)‘गायें, ब्राह्मण, वेद, सती स्त्री, सत्यवादी, लोभरहित और दानशील सन्त-महापुरुष – इन सातों के द्वारा यह पृथ्वी धारण की जाती है अर्थात इन पर पृथ्वी टिकी हुई है |’ अत सती स्त्रियों से पृथ्वी की, दुनिया की रक्षा होती है – ‘एक सती और जगत सारा, एक चन्द्रमा नौ लख तारा |’ इतना बल आपमें है | बाल वनिता महिला आश्रम🚩🚩🙏🙏🙏जय श्री राम 🙏🙏🙏🚩🚩

|| श्री हरि: || --- :: x :: --- 🥀🥀🙏सत्संग की आवश्यकता 🙏🥀🥀     By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब                अपने अन्त:करण में कोई गड़बड़ी आ जाय तो भगवान् को पुकारो, हे नाथ ! हे नाथ !! पुकारो | यह एक दवाई है असली भगवान् को याद करो, खूब मस्त रहो | अपने कल्याण के लिये, पति के कल्याण के लिये, माता-पिता के कल्याण के लिये भगवान् के भजन में लग जाओ | पुरुष यदि श्रेष्ठ, उतम होता है तो वह अपने ही कुल का उध्दार करता है; परन्तु स्त्री श्रेष्ठ होती है तो वह दोनों कुलों का उध्दार कर देती है –        एवा उतम गुण थी उभय सुकुल उजवालिये हे |        सखियाँ निज-निज निति धर्म सदा सम्भालिये हे || महाराज जनक चित्रकूट गये | वहाँ सीताजी सादे वेश में थीं | कितने प्रेम से पली थी सीताजी ! माता-पिता का उन पर बड़ा स्नेह था | जनकपुरी के कई राजकीय आदमी जनक जी के साथ में आये थे | उन्होंने सीताजी को साधारण वेश में देखा तो रो पड़े कि हमारे महाराज की पुत्री जंगल में रहकर दुःख पा रही है | रहने को जगह नहीं, खाने को अन्न नहीं, ...