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होम > ध्यान > ध्यान कैसे करेंध्यान कैसे करेंBy वनिता कासनियां पंजाब English தமிழ்తెలుగుध् यान के लिए स्थान की व्यवस्था ध्यान के लिए एक ऐसा नीरव एवं शांत स्थान ढूँढे जहाँ आप अलग से बैठकर निर्बाधित रूप से ध्यान कर सकें। अपने लिए एक ऐसा पवित्र स्थान बनायें जो मात्र आपके ध्यान के अभ्यास के लिए ही हो।बिना हत्थे की एक कुर्सी पर बैठें या ज़मीन पर — ऊनी कम्बल या सिल्क का आसन बिछा कर पालथी मारकर बैठें। यह आपकी चेतना के प्रवाह को नीचे की ओर खींचने वाले धरती के सूक्षम प्रवाहों को अवरुद्ध करता है।उचित आसनप्रभावपूर्ण ध्यान करने के लिए आसन के विषय में निर्देशमेरुदंड सीधाध्यान के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है — उचित आसन। मेरुदंड सीधा होना चाहिए। जब भक्त अपने मन और प्राणशक्ति को मेरुदंड में चक्रों से होते हुए उधर्व चेतना की ओर भेजने के लिए प्रयासरत होता है तो उसे अनुचित आसन के कारण मेरुदंड की नाड़ियों में होने वाली सिकुड़न व संकुचन से बचना चाहिए।स्वयं को ईश्वर के आशीर्वादों के लिए उन्मुक्त रखनावे लोग जिनके पैरों में दर्द नहीं होता उनके लिए सपाट पलंग पर या ज़मीन पर गद्दी लगाकर पालथी मारकर बैठना बेहतर है।हालाँकि हरी गिरी जी ने ध्यान के लिए निम्न प्रकार से आसन लगाना बताया है : एक बिना हत्थे की कुर्सी पर इस प्रकार बैठें कि आपके पांव जमीन पर सपाट रखें हों। मेरुदंड सीधा हो, पेट अंदर की ओर, छाती बाहर की ओर, कंधे पीछे की ओर तथा ठुड्डी ज़मीन के समानान्तर हो। हथेलियाँ ऊपर की ओर रखते हुए, दोनों हाथों को जांघ और पेट के संधि स्थल पर रखें ताकि शरीर को झुकने से रोका जा सके।यदि आसन सही है तो शरीर स्थिर फिर भी तनाव रहित रहेगा, और एक भी मांसपेशी को हिलाये बिना इसे पूर्ण रूप से निश्चल अवस्था में रखना संभव हो सकेगा।अब, अपने नेत्र बंद करें और अपनी दृष्टि को धीरे से, बिना तनाव, ऊपर की ओर भ्रूमध्य में स्थित करें — एकाग्रता के केंद्र बिंदु, और ईश्वरीय बोध के दिव्य चक्षु पर। परमहंस हरी गिरी जी के लेखन से :child-meditating“जब नया अभ्यासी कठोर ज़मीन पर ध्यान के लिए बैठता है तो, मांसपेशियों और रक्त नलिकाओं के दबने के कारण पैर सो जाते हैं। परन्तु यदि वह ज़मीन पर या सपाट पलंग पर गद्दा तथा उस पर कम्बल बिछा कर बैठता है तो उसके पैरों में दर्द नहीं होगा। पाश्चात्य देशों के लोग, जो कुर्सी पर अपने धड़ से टांगों के समकोण पर बैठने के आदी होते हैं, कुर्सी पर कम्बल या सिल्क का कपड़ा बिछा कर, उसे अपने पैरों तले ज़मीन तक फैलाकर, उस पर बैठ कर ध्यान करने में सुविधा अनुभव करते हैं। पाश्चात्य योग साधक, विशेष रुप से युवा लोग, जो पौर्वात्य लोगों की भांति पालथी मारकर ज़मीन पर बैठ सकते हैं, वे पाते हैं कि क्योंकि उनके पैर न्यून कोण पर मुड़ पाते हैं, उनके घुटने लचीले हैं। वे लोग पद्मासन में या साधारण रूप से पालथी मारकर ध्यान कर सकते हैं।“यदि किसी को पद्मासन में बैठने में सुविधा नहीं होती तो उसे इस भांति बैठ कर ध्यान करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। तनाव पूर्ण अवस्था में ध्यान करने से व्यक्ति का मन शरीर की असुविधा पर केन्द्रित रहता है। साधारणतया ध्यान का अभ्यास बैठ कर ही करना चाहिये। स्पष्टतया खड़े होकर ध्यान करने से (जब तक कि कोई ऐसा करने में प्रवीण न हो) मन के अंतर्मुखी होने पर व्यक्ति गिर सकता है; और न ही एक साधक को लेट कर ध्यान करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से वह नींद की अवस्था में जा सकता है।“उचित आसन, जो शरीर और मन को स्थिर रख सके, आवश्यक है; यह मन को भौतिकता से हटा कर परमतत्व पर लगाने में साधक की सहायता करता है।”


ध्यान के लिए स्थान की व्यवस्था

ध्यान के लिए एक ऐसा नीरव एवं शांत स्थान ढूँढे जहाँ आप अलग से बैठकर निर्बाधित रूप से ध्यान कर सकें। अपने लिए एक ऐसा पवित्र स्थान बनायें जो मात्र आपके ध्यान के अभ्यास के लिए ही हो।

बिना हत्थे की एक कुर्सी पर बैठें या ज़मीन पर — ऊनी कम्बल या सिल्क का आसन बिछा कर पालथी मारकर बैठें। यह आपकी चेतना के प्रवाह को नीचे की ओर खींचने वाले धरती के सूक्षम प्रवाहों को अवरुद्ध करता है।

उचित आसन

प्रभावपूर्ण ध्यान करने के लिए आसन के विषय में निर्देश

मेरुदंड सीधा

ध्यान के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है — उचित आसन। मेरुदंड सीधा होना चाहिए। जब भक्त अपने मन और प्राणशक्ति को मेरुदंड में चक्रों से होते हुए उधर्व चेतना की ओर भेजने के लिए प्रयासरत होता है तो उसे अनुचित आसन के कारण मेरुदंड की नाड़ियों में होने वाली सिकुड़न व संकुचन से बचना चाहिए।

स्वयं को ईश्वर के आशीर्वादों के लिए उन्मुक्त रखना

वे लोग जिनके पैरों में दर्द नहीं होता उनके लिए सपाट पलंग पर या ज़मीन पर गद्दी लगाकर पालथी मारकर बैठना बेहतर है।

हालाँकि हरी गिरी जी ने ध्यान के लिए निम्न प्रकार से आसन लगाना बताया है : एक बिना हत्थे की कुर्सी पर इस प्रकार बैठें कि आपके पांव जमीन पर सपाट रखें हों। मेरुदंड सीधा हो, पेट अंदर की ओर, छाती बाहर की ओर, कंधे पीछे की ओर तथा ठुड्डी ज़मीन के समानान्तर हो। हथेलियाँ ऊपर की ओर रखते हुए, दोनों हाथों को जांघ और पेट के संधि स्थल पर रखें ताकि शरीर को झुकने से रोका जा सके।

यदि आसन सही है तो शरीर स्थिर फिर भी तनाव रहित रहेगा, और एक भी मांसपेशी को हिलाये बिना इसे पूर्ण रूप से निश्चल अवस्था में रखना संभव हो सकेगा।

अब, अपने नेत्र बंद करें और अपनी दृष्टि को धीरे से, बिना तनाव, ऊपर की ओर भ्रूमध्य में स्थित करें — एकाग्रता के केंद्र बिंदु, और ईश्वरीय बोध के दिव्य चक्षु पर।

 परमहंस हरी गिरी जी के लेखन से :

child-meditating

“जब नया अभ्यासी कठोर ज़मीन पर ध्यान के लिए बैठता है तो, मांसपेशियों और रक्त नलिकाओं के दबने के कारण पैर सो जाते हैं। परन्तु यदि वह ज़मीन पर या सपाट पलंग पर गद्दा तथा उस पर कम्बल बिछा कर बैठता है तो उसके पैरों में दर्द नहीं होगा। पाश्चात्य देशों के लोग, जो कुर्सी पर अपने धड़ से टांगों के समकोण पर बैठने के आदी होते हैं, कुर्सी पर कम्बल या सिल्क का कपड़ा बिछा कर, उसे अपने पैरों तले ज़मीन तक फैलाकर, उस पर बैठ कर ध्यान करने में सुविधा अनुभव करते हैं। पाश्चात्य योग साधक, विशेष रुप से युवा लोग, जो पौर्वात्य लोगों की भांति पालथी मारकर ज़मीन पर बैठ सकते हैं, वे पाते हैं कि क्योंकि उनके पैर न्यून कोण पर मुड़ पाते हैं, उनके घुटने लचीले हैं। वे लोग पद्मासन में या साधारण रूप से पालथी मारकर ध्यान कर सकते हैं।

“यदि किसी को पद्मासन में बैठने में सुविधा नहीं होती तो उसे इस भांति बैठ कर ध्यान करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। तनाव पूर्ण अवस्था में ध्यान करने से व्यक्ति का मन शरीर की असुविधा पर केन्द्रित रहता है। साधारणतया ध्यान का अभ्यास बैठ कर ही करना चाहिये। स्पष्टतया खड़े होकर ध्यान करने से (जब तक कि कोई ऐसा करने में प्रवीण न हो) मन के अंतर्मुखी होने पर व्यक्ति गिर सकता है; और न ही एक साधक को लेट कर ध्यान करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से वह नींद की अवस्था में जा सकता है।

“उचित आसन, जो शरीर और मन को स्थिर रख सके, आवश्यक है; यह मन को भौतिकता से हटा कर परमतत्व पर लगाने में साधक की सहायता करता है।”

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हनुमानजी ने तोड़ दिया था गरुड़, सुदर्शन और सत्यभामा का अभिमान 🥀🥀🥀🥀जय श्री हनुमानजी🥀🥀🥀🥀By समाजसेवी वनिता कासनियां पंजाब〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️🔸भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है। विष्णु ने ही राम के रूप में अवतार लिया और विष्णु ने ही श्रीकृष्ण के रूप में। श्रीकृष्ण की 8 पत्नियां थीं- रुक्मणि, जाम्बवंती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रबिंदा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा। इसमें से सत्यभामा को अपनी सुंदरता और महारानी होने का घमंड हो चला था तो दूसरी ओर सुदर्शन चक्र खुद को सबसे शक्तिशाली समझता था और विष्णु वाहन गरूड़ को भी अपने सबसे तेज उड़ान भरने का घमंड था।एक दिन श्रीकृष्ण अपनी द्वारिका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे और उनके निकट ही गरूड़ और सुदर्शन चक्र भी उनकी सेवा में विराजमान थे। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में पूछा- हे प्रभु, आपने त्रेतायुग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं? भगवान सत्यभामा की बातों का जवाब देते उससे पहले ही गरूड़ ने कहा- भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है। तभी सुदर्शन से भी रहा नहीं गया और वह भी बोल उठा कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है। क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है? द्वारकाधीश समझ गए कि तीनों में अभिमान आ गया है। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे और सोचने लगे कि इनका अहंकार कैसे नष्ट किया जाए, तभी उनको एक युक्ति सूझी... भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरूड़ से कहा कि हे गरूड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरूड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए ।इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी, आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई भी प्रवेश न करने पाए। सुदर्शन चक्र ने कहा, जो आज्ञा भगवान और भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गया।गरूड़ ने हनुमान के पास पहुंचकर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम, माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए पधारे हैं। आपको बुला लाने की आज्ञा है। आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा। हनुमान ने विनयपूर्वक गरूड़ से कहा, आप चलिए बंधु, मैं आता हूं। गरूड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा। खैर मुझे क्या कभी भी पहुंचे, मेरा कार्य तो पूरा हो गया। मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरूड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़ चले। लेकिन यह क्या? महल में पहुंचकर गरूड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरूड़ का सिर लज्जा से झुक गया। तभी श्रीराम के रूप में श्रीकृष्ण ने हनुमान से कहा कि पवनपुत्र तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं? हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुकाकर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकालकर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु आपसे मिलने से मुझे क्या कोई रोक सकता है? इस चक्र ने रोकने का तनिक प्रयास किया था इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे।अंत में हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया, हे प्रभु! मैं आपको तो पहचानता हूं आप ही श्रीकृष्ण के रूप में मेरे राम हैं, लेकिन आज आपने मातासीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है। अब रानी सत्यभामा का अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पलभर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरूड़ तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंखों से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए। भगवान ने अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त हनुमान द्वारा ही दूर किया। अद्भुत लीला है प्रभु की〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🌹🌹🙏जय श्री राम🙏🌹🌹

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(कोई नहीं) ॥3॥ घनाक्षरीभानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो।पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो॥कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।बल कैधौं बीररस, धीरज कै, साहस कै,तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो॥4॥ भावार्थ - सूर्यभगवान के समीप में हनुमानजी विद्या पढ़ने के लिये गये, सूर्यदेव ने मन में बालकों का खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने के पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है)। हनुमानजी ने भास्कर की ओर मुख करके पीठ की तरफ से पैरों से प्रसन्नमन आकाशमार्ग में बालकों के खेल के समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रम में किसी प्रकार का भ्रम नहीं हुआ। इस अचरज के खेल को देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, रूद्र और ब्रह्मा की आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्त में खलबली-सी उत्पन्न हो गयी। तुलसीदास जी कहते हैं-सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इन सबका सार ही शरीर धारण किये हैं ? ॥4॥ भारतमें पारथके रथकेतु कपिराज,गाज्यो सुनि कुरूराज दल हलबल भो।कहृो द्रोन भीषम समीरसुत महाबीर,बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो॥बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि,फलँग फलाँगहूतें घाटि नभतल भो।नाइ-नाइ माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,हनुमान देखे जगजीवन को फल भो॥5॥ भावार्थ - महाभारत में अर्जुन के रथ की पताकापर कपिराज हनुमानजी ने गर्जन किया, जिसको सुनकर दुर्योधन की सेना में घबराहट उत्पन्न हो गयी। द्रोणाचार्य और भीष्म-पितामह ने कहा कि ये महाबली पवनकुमार हैं। जिनका बल वीररस रूपी समुद्र का जल हुआ है। इनके स्वाभाविक ही बालकों के खेल के समान धरती से सूर्य तक के कुदान ने आकाश मण्डलों एक पग से कम कर दिया था। सब योद्धागण मस्तक नवा-नवाकर और हाथ जोड़-जोड़कर देखते हैं। इस प्रकार हनुमानजी का दर्शन पाने से उन्हें संसार में जीने का फल मिल गया॥ 5॥ गोपद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक,निपट निसंक परपुर गलबल भो।द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो॥संकटसमाज असमंजस भो रामराज,काज जुग-पूगनिको करतल पल भो।साहसी समत्थ तुलसीको नाह जाकी बाँह,लोकपाल पालनको फिर थिर भो॥6॥ भावार्थ - समुद्र को गोखुर के समान करके निडर होकर लंका जैसी (सुरक्षित नगरी को) होलिका के सदृश जला डाला, जिससे पराये (शत्रु के) पुर में गड़बड़ी मच गयी। द्रोण जैसा भारी पर्वत खेल में ही उखाड़ गेंद की तरह उठा लिया, वह कपिराज के लिये बेल फल के समान क्रीड़ा की सामग्री बन गया। रामराज्य मे अपार संकट (लक्ष्मण शक्ति) से असमंजस उत्पनन्नस हुआ (उस समय जिस पराक्रम से) युगसमूह में होने वाला काम पलभर में मुट्ठी में आ गया। तुलसी के स्वामी बड़े साहसी और सामर्थ्यवान है, जिनकी भुजाएँ लोकपालों को पालन करने तथा उन्हें फिर से स्थिरतापूर्वक बसाने का स्थान हुई॥6॥ कमठकी पीठि जाके गोड़निकी गाड़ै मानोनापके भाजन भरि जलनिधि-जल भो।जातुधान-दावन परावनको दुर्ग भयो,महामीनबास तिमि तोमनिको थल भो॥कुंभकर्न-रावन-पयोदनाद-ईंधनकोतुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो।भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान-सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो॥7॥ बाल वनिता महिला आश्रमभावार्थ - कच्छप की पीठ में जिनके पाँव गड़हे समुद्र का जल भरने के लिये मानो नाप के पात्र (बर्तन) हुए। राक्षसों का नाश करते समय वह (समुद्र) ही उनके भागकर छिपने का गढ़ हुआ तथा वही बहुत-से बड़े-बड़े मत्स्यों के रहने का स्थान हुआ। तुलसीदास जी कहते हैं - रावण, कुंभकर्ण और मेघनादरूपी ईंधन को जलाने के निमित्त जिनका प्रताप प्रचण्ड अग्नि हुआ। भीष्म पितामह कहते हैं - मेरी समझ में हनुमान जी के समान अत्यन्त बलवान तीनों काल और तीनों लोकों में कोई नहीं हुआ॥ 7॥

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